
पिरोजन समारोह — वही है जिसे शास्त्रों में कर्णवेध संस्कार कहते हैं। हिंदी शब्दकोश में इसका सीधा अर्थ है: “बालक के कान छेदने की रीति, कनछेदन”। मारवाड़ी-राजस्थानी परिवारों में इसे प्यार से ‘पिरोजन’ बोलते हैं, क्योंकि ‘पिरोना’ मतलब धागे में मोती या सोने का तार डालना — कान में पहला सोने का तार पिरोया जाता है।

हिंदू धर्म के 16 संस्कारों में कर्णवेध नवम संस्कार है। • श्रवण शक्ति और बुद्धि: कहा जाता है कि कान छेदने से श्रवण इंद्रिय तेज होती है और बौद्धिक विकास में मदद मिलती है। • कन्याओं के लिए विशेष: “विशेषकर कन्याओं के लिये तो कर्णवेध नितान्त आवश्यक माना गया है” — आभूषण धारण और स्त्रीत्व की पूर्णता का प्रतीक। • स्वास्थ्य दृष्टि: शास्त्रों में लिखा है कि दोनों कानों में सोना पहनाने से नसें ठीक रहती हैं, और यह आधुनिक एक्यूपंक्चर जैसी पद्धति से मिलता-जुलता है। लड़कियों में नाक-कान छेदने लाभदायक माना गया है।



